२२ नवंबर २०११; मैं ग्यारहवीं कक्षा में। भारत सरकार के प्रताप से मुझे पहली बार विदेशी धरती पर कदम रखने का अवसर मिल रहा था JENESYS के अंतर्गत, वो भी उगते सूरज के देश जापान में। यूँ तो नेपाल भी घूम चुका था तब तक (एक घंटे वाला) पर असली विदेश यही था।

तब तक इतिहास हर कोई पढ़ चुका होता है; हमने भी पढ़ा था दूसरा विश्वयुद्ध। जापान के ऊपर दो परमाणु विस्फोट हुए थे। हर कोई ये भी जान चुका होता है कि उसके बाद भी जापान अपने बल पर ऊपर उठकर खड़ा हुआ और विकसित देश बना। साधारण सी बात है कि मेरे मन में यही कुछ विचार थे जापान के लिए; देशप्रेमी मेहनती लोग, विकसित देश आदि। काफी अच्छी छवि एक। कुछ डर भी थे; उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण ये कि कहीं मैं माँसाहारी न बन जाऊँ 😁। तड़के ५-६ बजे करीब पहुँचने वाले थे। बस सुबह जब हवाईजहाज की खिड़की से पहली बार जापान देखा तो मैं सब भूल गया। उद्वेगना की जगह उत्तेजना ले चुकी थी; जितना नीचे आ रहे थे उतनी ही बढ़ रही थी। ५ मिनट में उतरना था, तब भी कोशिश कर रहा था कि खिड़की से ही पूरा देश देख डालूँ।

खैर ये ५ मिनट भी गुज़रे। नरीता हवाई अड्डा अपने इंदिरा गांधी हवाई अड्डे से उतना भी अच्छा तो नहीं लग रहा था, पर बाहर आए तो पता चल गया कि कहीं और आया हूँ। ऊँची ऊँची इमारतें, सड़कों का जाल, सफाई इतनी कि प्रधानमंत्री के आने के बाद भी School में न हो पाए; पहले आधे घंटे में ही दिल जीत लिया जापान ने। भारत देश में उपहास के पात्र सड़क नियमों का दूसरे जापानियों के साथ पालन करके मानो जीवन भर का प्रायश्चित किया वहाँ। मन में आ रहा था कि इतना कुछ देख लिया, अब क्या ही होगा। तब पता नहीं था कि ये जगह अभी जीवन भर के लिए छाप छोड़ के जाने वाली है।

हम २०-२२ बच्चों के साथ दो जापानी महिलाओं को रखा गया था, जो हमारा मार्गदर्शन करने के साथ साथ हमारे मन में आ रहे अनगिनत प्रश्नों के उत्तर दे रहीं थीं। उनको हम नाकासान और यामासान (“सान” महिलाओं के लिए जापानी में संबोधन है) बुलाते थे। चूँकि उनको किसी भारतीय भाषा का ज्ञान नहीं था तो अंग्रेज़ी में ही बात चल रही थी। पहले दिन जब नाकासान से हम सब बात कर रहे थे तो उन्होंने बताया कि अंग्रेज़ी बहुत अच्छी है; यहाँ जापान में अधिकतर लोग ना के बराबर ही अंग्रेज़ी जानते हैं। हम ने बताया कि हमारे लगभग हर विद्यालय का शिक्षा माध्यम अंग्रेज़ी है, तो काफी हैरान हुईं।

हैरान तो मैं भी बचपन से था। घर पर अंग्रेज़ी पढ़ने पर इतना ज़ोर दिया जाता था कि मुझे चिढ़ हो जाती थी। बोलता था कि मुझे नहीं सीखनी तो डाँट डपट कर चुप करा दिया जाता था। “जीवन सही से जीना है तो वो अंग्रेज़ी के बिना संभव नहीं है; नौकरी के लिए साक्षात्कार(Interview) क्या हिंदी में देगा?” कुछ इस तरह का जवाब मिलता था। “सामनेवाला हिंदी जानता होगा, मैं हिंदी जानता हूँ, तो हिंदी में बात करूँ तो दिक्कत क्या है?” शायद कभी पलटकर बोला भी हो तो तब तक बहस खत्म हो चुकी होती थी। धीरे धीरे मुझे भी यकीन होने लगा था कि अंग्रेज़ी के बिना जीवन असंभव ही है। आखिर सब Mobile-Computer अंग्रेज़ी में ही तो होते हैं, और उस वक्त तक मेरा Mobile के बिना जीना असंभव सा ही हो चला था 😉। मैं भी उसी मानसिकता के वश में आ रहा था जिसके वश में आज देश की बहुमत जनता है। जो अंग्रेज़ी के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती। पर जापान में एक ऐसी चीज़ दिख गई जिससे उस सोच की जड़ें ही हिल गईं। सड़क पर दिशानिर्देश, दुकानों के ‘Menu’, ‘Mall’ में सामान, लगभग हर चीज़ मैं जापानी में देख ही चुका था, पर अभी वो आखिरी चोट पड़नी बाकी थी अंग्रेज़ी पर।

पहले दिन से मैं देख रहा था कि नाकासान हमसे बात करते समय बीच बीच में अपने ‘Mobile’ जैसी किसी चीज़ में देख रहीं थी। थोड़ा अजीब लग रहा था वो, पर तब ध्यान कहीं और चला गया होगा। अगला ही दिन था शायद (स्मरणशक्ति जरा भी अच्छी नहीं, गलत याद हो कुछ तो क्षमा); हम सब पैदल कहीं जा रहे थे तब ये फिर हुआ होगा, तो किसी ने पूछ ही लिया कि चक्कर क्या है। जवाब मिला कि एक शब्दकोश है ‘Mobile’ में जापानी से अंग्रेज़ी का, तो जब भी अंग्रेज़ी का कोई शब्द नहीं आता ध्यान तो उसमें देखकर हमसे बात करती हैं। हल्का सा अचंभा हुआ और शायद मन में आया भी होगा कि सही चीज़ है, काश अपने पास भी होती। शायद मैं पास में ही खड़ा था; लंबा हूँ ही तो उचक कर देखने की कोशिश की कि है क्या। नज़र गई तो “Keypad” जापानी में दिखा, और बस मानो आँखें खुल गईं उस दिन। मन में अंग्रेज़ी हीनभावना की जड़ पर सीधा हमला हुआ।

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“झूठ है। ये सारा झूठ है। Drama चल रहा है मेरे चारों तरफ। मुझे बेवकूफ बनाया जा रहा है।”

Rockstar में रणबीर कपूर का ये आलाप(Dialogue) मैंने सुना तो इसके २-३ साल बाद था पर इससे बेहतर कोई चीज़ मेरा वर्णन नहीं कर सकती। “अबे यहाँ तो Phone तक जापानी में बन रहे हैं, तो अपने यहाँ चल क्या रहा है? अपने यहाँ क्यों नहीं हैं हिंदी के Mobile-Computer?” सवाल स्वाभाविक थे, पर बहुत बड़े। अंग्रेज़ी से केवल एक इसी चीज़ पर मैंने मन में हार स्वीकार की थी; ये सोचा था कि अंग्रेज़ी में ही ये सब चीज़ें हो सकती हैं। जापान ने उस पूरी अंग्रेज़ी इमारत की नींव पर ही हथौड़ा मारा देके। पता चल गया मुझे उस दिन वापिस कि होने को कुछ भी हो सकता है। बाबा रामदेव का कथन, कि “करने से ही होगा!!”।

आज ९ साल करीब हो चुके उस बात को। आज भी मातृभाषा के लिए खड़ा हूँ। कई तरह के प्रश्न आए बाद में भी; पढ़ाई कैसे होगी, किताबें कहाँ से आएंगी, इतनी सारी भाषाएँ कैसे संभाली जाएंगी, इतने सारे लोगों में इस स्तर तक हीनभावना और गलत ज्ञान है इतने बड़े देश में; कैसे आएगा बदलाव? सबके उत्तर नहीं मिले हैं, पर मन में जब भी अविश्वास आता है तो ये बात याद रहती है। “Mobile-Computer अगर जापानी में हो सकता है तो सब कुछ हो सकता है”। केवल मन बदलने की बात है, और वो इसी घटना के बाद सीखा। असमर्थता का पाठ पढ़ने के बजाए उसके हल खोजना।

जापान से अब भी प्यार है बहुत। अमिट छाप एक। दिखाने के लिए कि विकास के लिए किसी भाषा या संस्कृति या मानसिकता की दासता करना आवश्यक नहीं। जरूरत है तो अपनी संस्कृति एवं अपने आप में विश्वास की। अगर मेरी या मेरी किसी चीज़ की स्थिति खराब है तो उसके लिए ज़िम्मेदार कोई भाषा या कोई असमर्थता नहीं हम खुद हैं। और जब तक हम खुद कुछ नहीं करते किसी और से कोई आशा भी नहीं रख सकते। बाकी बात मातृभाषा की, तो जब लोग चिंता ही नहीं कर रहे, भाव नहीं हैं शायद मातृभाषा के लिए तो एक ही हल है। भाव जगाना।

      जय हिंद, जय भारत      

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